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बस्तर हेरिटेज मैराथन, उम्र की सीमाओं को लांघकर दौड़ पड़ा जज्बा दिव्यांग पीयूष ने पेश की अटूट साहस की मिसाल

जगदलपुर = 22 मार्च  बस्तर की ऐतिहासिक धरा पर आज ‘बस्तर हेरिटेज मैराथन’ के दौरान एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने फिटनेस और जुनून की एक नई इबारत लिख दी। इस दौड़ में उत्साह का सैलाब कुछ इस कदर उमड़ा कि उम्र के फासले धुंधले पड़ गए और हर कदम में केवल जीत का संकल्प नजर आया। इस मैराथन की सबसे प्रेरक गाथा दंतेवाड़ा स्थित कृषि महाविद्यालय के प्राचार्य पीयूष कुमार ने लिखी। एक दुर्भाग्यपूर्ण हादसे में अपना एक पैर गंवा देने के बावजूद पीयूष ने हिम्मत नहीं हारी और मैराथन के आयोजन की खबर मिलते ही इसे अपनी चुनौतियों को मात देने का जरिया बना लिया। उन्होंने न केवल 5 किलोमीटर की दौड़ में हिस्सा लिया, बल्कि अपने कृत्रिम अंग और अदम्य साहस के बल पर इसे सफलतापूर्वक पूरा कर हर उस व्यक्ति के लिए मिसाल पेश की जो मुश्किलों के आगे घुटने टेक देते हैं। ​दौड़ का यह कारवां केवल युवाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें पीढ़ी दर पीढ़ी का संगम देखने को मिला। जगदलपुर के मात्र 5 वर्षीय नन्हे वंश ने जहां अपने छोटे कदमों से सबका दिल जीत लिया, वहीं 72 वर्षीय गुरमील सिंह ने सबसे बुजुर्ग प्रतिभागी के रूप में दौड़ पूरी कर यह साबित किया कि हौसला कभी बूढ़ा नहीं होता। हरियाणा से आए 60 वर्षीय किशन लाल ने सुबह जल्दी उठने और व्यायाम करने के अपने नियम को दौड़ में बदलकर बीमारियों से दूर रहने का संदेश दिया, तो वहीं 53 वर्षीय विरेंदर ने आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करने के उद्देश्य से आज पूरी ऊर्जा के साथ दौड़ लगाई।

मैराथन में उत्तर प्रदेश की रक्तिमा यादव और झारखंड के भीम कुमार रॉय की भागीदारी ने इसे व्यापक स्वरूप प्रदान किया। हैदराबाद से आए एक्स-सर्विसमैन मदन गोपाल ने सेना के अपने उसी पुराने अनुशासन और स्फूर्ति का परिचय दिया, जिसने दर्शकों में जोश भर दिया। वरिष्ठ नागरिकों की श्रेणी में 71 वर्षीय सरोज साहू, 69 वर्षीय नीलकंठ साहू, 65 वर्षीय किशोर जाधव और लता लूनिया के साथ-साथ 63 वर्षीय संजय शर्मा सहित अन्य प्रतिभागियों ने भी पूरी लगन के साथ अपनी दौड़ पूरी की। ​बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर उम्र के लोगों का यह अपार उत्साह इस बात का प्रतीक बना कि स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और जीवन जीने का जज्बा किसी भी शारीरिक या उम्र संबंधी बाधा से कहीं ऊपर है। बस्तर हेरिटेज मैराथन ने न केवल खेल भावना को बढ़ावा दिया, बल्कि समाज को एकता और निरंतर चलते रहने की प्रेरणा भी दी।

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