आपदा की आशंका पर छत्तीसगढ़ ने निभाया पड़ोसी धर्म, ओडिशा सीमा पर भालूगुड़ा एनीकट के सभी 38 जलद्वार खोले
कृषकों ने जनहित में त्यागा अपना हित, छत्तीसगढ़–ओडिशा के बीच संवेदनशीलता, सहयोग और मानवीय समन्वय की अनुकरणीय मिसाल

जगदलपुर =25 अक्टूबर आगामी 27 एवं 28 अक्टूबर को संभावित चक्रवाती वर्षा एवं बाढ़ की आशंका को दृष्टिगत रखते हुए छत्तीसगढ़ जल संसाधन विभाग ने पड़ोसी राज्य ओडिशा के प्रति संवेदनशीलता एवं सहयोग का परिचय देते हुए अंतरराज्यीय सीमा पर स्थित भालूगुड़ा एनीकट के सभी 38 जलद्वार पूर्णतः खोल दिए हैं।
उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ शासन की नीति के अनुरूप वर्षा ऋतु समाप्त होने के पश्चात 15 सितंबर तक प्रदेश की एनीकट योजनाओं के जलद्वार स्थानीय निस्तारी, सिंचाई एवं भूजल पुनर्भरण के उद्देश्य से बंद कर दिए जाते हैं। बस्तर क्षेत्र में भी इस व्यवस्था का पालन किया गया था।
भालूगुड़ा एनीकट के कुल 38 जलद्वारों में से 28 पूर्व से क्रियाशील थे, जबकि शेष 10 जलद्वार स्थानीय निस्तारी हेतु जल संचयन सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बंद रखे गए थे। किंतु संभावित चक्रवाती आपदा एवं ओडिशा जल संसाधन विभाग के विशेष आग्रह को देखते हुए छत्तीसगढ़ जल संसाधन विभाग की विद्युत एवं यांत्रिकी शाखा, बस्तर द्वारा ओडिशा जल संसाधन विभाग एवं एनएमडीसी के समन्वय से शेष 10 जलद्वार भी खोल दिए गए।
अधीक्षण अभियंता जल संसाधन इंद्रावती परियोजना मंडल जगदलपुर वेदप्रकाश पांडे ने इस बारे में बताया कि उक्त कार्यवाही के दौरान स्थानीय कृषकों ने जल संचयन एवं निस्तारी की आवश्यकताओं को लेकर प्रारंभ में विरोध व्यक्त किया। किंतु जल संसाधन विभाग एवं स्थानीय प्रशासन द्वारा संभावित आपदा की गंभीरता तथा पड़ोसी राज्य के नागरिकों की सुरक्षा का महत्व समझाए जाने पर कृषकों ने व्यापक जनहित को सर्वोपरि रखते हुए सभी जलद्वार खोलने की सहर्ष सहमति प्रदान की।
बस्तर के कृषकों का यह संवेदनशील एवं उदार निर्णय भारतीय संस्कृति के महान आदर्श ‘परहित सरिस धरम नहि भाई’ की भावना को चरितार्थ करता है।
छत्तीसगढ़ जल संसाधन विभाग की यह पहल न केवल संभावित आपदा के प्रति सजगता एवं अंतरराज्यीय सहयोग का उदाहरण है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि मानवीय संवेदनशीलता, जनसुरक्षा एवं पड़ोसी धर्म के निर्वहन में राज्यों की सीमाएँ बाधक नहीं बन सकतीं।




