साहित्यकारों का महत्वपूर्ण पर्व शरद पूर्णिमा बेहद उत्साह के साथ आज रविवार को मनाया गया।
शहर के प्रतिष्ठिरत साहित्यकारों ने अपनी उत्कृष्ठ रचनाओं से आज के दिन का स्वागत किया

जगदलपुर = क्षेत्र के हल्बी भतरी हिन्दी के साहित्यकार नरेन्द्र पाढ़ी ने अपनी कविता में बताया कि-
कसन भुलकवां, जोनी उजर चो मइमा के,
सरत पुर्णिमा के, आजी चो दिन, अमृत बरसेदे,
महालखमि चो दरसा होयदे, गोरस चो खीर बनेदे।
युवा ग़ज़लकार डॉ बी प्रकाश मूर्ति ने अपनी पंक्तियों के माध्यम से खूब तालियां बटोरीं।
मुसीबत में तेरा दिलासा बहुत है / ये गिरते हुये को सहारा बहुत है।
अपनी नवीन कविताओं से नवीन रस रचने वाली सतरूपा मिश्रा ने संदेशप्रद ये कविता प्रस्तुत की।
हृदय की परिधि / बस इतनी बड़ी रखो
जहां तुम्हारी आवश्यकता की चीजें
सहजता से समा सके…।
दिखावे की वस्तुओं के लिये / कोई जगह न हो।
युवा ग़ज़लकार कृष्णशरण पटेल कृष्णा ने सस्वर ग़ज़ल का पाठ कर जीवन का रहस्य बताया।
बचपन तो सुहाना है, हसीन ये जवानी है /जीवन में कुछ तो करो, उमर निकल जानी है।
श्रृंगार की कवयित्री ममता मधु ने प्रेम की बातें कुछ इस तरह से कहीं- नजरों से बात कर गया कोई, इशारों ही इशारों से दिल को उड़ा ले गया कोई।
बहुभाषी आशुकवि अनिल शुक्ल जी ने शरद ऋतु का स्वागत इन पंक्तियों से किया-
शरद चंद्र की ये शीत किरणें, एक दिव्य ज्योति जला रही हैं / कलानिधि का स्वरूप दमका चांदनी गुनगुना रही हैं।
ग़ज़लकार विपिन विहारी दाश ने सुखी जीवन के लिये पंक्तियां प्रस्तुत की-
इतना भी मत बोलो कि जुबां बदजुबां हो जाये / इतना भी लौ मत बढ़ाओ कि रौशनी धुआं हो जाये।
वरिष्ठ कवि अवधकिशोर शर्मा ने राजनीति पर व्यंग्य कसते हुये कहा कि-
पता नहीं हम किसको चुन लें किसे निगलें /राजनीति की देख रहे हैं बेढब चालें।
धूर्त लकड़बग्धों के एवज बेहतर है हम शेर पाल लें। / कहां रहे अब ऐसे शिल्पी अन्तस के जो भाव ताड़ लें।
सदाबहार गायक कवि डॉ राजेश थनथराटे काव्य रूप में मोहब्बत का चित्र प्रस्तुत किया।
तुझे मुझसे मुहब्बत न थी / और मैं तुझी से प्यार करता रहा।
तेरी बेरूखी से टूट कर बिखरता रहा / और अपनी उम्मीदों से संवरता रहा।
नारीवादी कवयित्री और समाजसेविका गीता शुक्ला ने नारी के पक्ष में अपनी बातें काव्यरूप में रखीं
मैं नारी हूं अबला नहीं / मैं ज्वाला हूं शबनम नहीं।
लगभग सभी रसों में अपनी कलम चलाने वाले विनय श्रीवास्तव ने अबकी बार पति पत्नी के संबंधों को विषय वस्तु बनाकर हास्य रस में डूबी कविता सुनाकर खूब हंसाया।
सजकर सम्मुख जो तुम आ जाओ,
आधा बल तुम मेरा बाली सा हर लेती हो
फिर भी जाने कैसे, अबला तुम कहलाती हो।
हास्य में कलम चलाने वाले नामचीन कवि शशांक श्रीधर ने गंभीर रचना प्रस्तुत कर सभा को अचंभित कर दिया।
लक्ष्य है मोक्ष / पर भागता है सांसारिक कर्तव्यों से
निरीह मत बन, दृढ़ होकर चल / खेनी है नाव मंझधार में
किनारे की मत सोच / पहले टकरा, तूफानी लहरों से
राजा रामचंद्र सा भाग्य तेरा, / पर पहले वनवास तो भोग।
युवाकवि सुरेन्द्र कुमार ने कलाधर घनाक्षरी छंद में आध्यात्मिक छंदबद्व रचना पढ़कर सुनायी।
शुद्व हो प्रबुद्व हो रहे नहीं विकार शेष / जो अखंड दीप सा जले वही महान है।
बस्तर कोकिला डालेश्वरी पाण्डे ने सुमधुर कंठ से राम जी का वंदना गीत प्रस्तुत कर सभी को झूमने पर मजबूर कर दिया।
सारा जग है दास हो जिनका / जग के जो राजदुलारे हैं।
युवा कवि भोजराज साहू की सस्वर पाठकर साबित कर दिया कि वे भष्यि के प्रसिद्व मंचीय कवि बनेंगे।
इन अभागों को पता नहीं क्या भला और क्या बुरा / ये तो बस निकले थे घर न्याय पाने को सदा।
युवा कवि ओमप्रकाश ध्रुव ने नदी की व्यथा सुनाते हुये नदी का पक्ष रखा कि -वाह रे इंसान मुझे मां बुलाते हो। और फिर मेरा हक दबाते हो।
कार्यक्रम का संचालन करते हुये साहित्य एवं कला समाज जगदलपुर के अध्यक्ष सनत सागर ने राजनीति पर निशाना साधते हुये अपनी गजल में कहा कि –
अपुन है इस देश का परमानेंट मालिक, समझे क्या। / अपुन के बापदादा लड़े देश के लिये, समझे क्या।
तोड़ फोड़ भी सकते हैं हम रातों रात, समझे क्या। / ये देश हमने बनाया है बरसों बरस, समझे क्या।
कार्यक्रम सोनी गली में आयोजित हुआ जो देर रात तक चलता रहा।




