नक्सली खात्मे से अबूझमाड़ में फिर जीवंत हुई आदिवासी संस्कृति, घोटुल में गूंजने लगी मांदर की थाप
शाम होते ही गांव में उत्साह का माहौल घोटुल प्रतिदिन सजने लगी गीतों से चेलिक मोटीहारिन झूमने लगे फिर देखने को मिल रही है संस्कृति की झलक

नारायणपुर =27 अगस्त अबूझमाड़ की शामें अब फिर से बदल रही हैं। कभी बंदूक की आवाज और भय के साये में सिमटे गांवों में अब मांदर की थाप सुनाई देने लगी है। सूर्य ढलते ही गांवों में उत्साह का माहौल बनता है और घोटुल की ओर कदम बढ़ने लगते हैं। चेलिक और मोटियारिनों की मौजूदगी से घोटुल फिर गुलजार होने लगे हैं। गीतों की मधुर स्वर लहरियां, पारंपरिक नृत्य और मांदर की थाप आदिवासी जीवन में लौट रही खुशियों की कहानी कह रही हैं।
घोटुल आदिवासी समाज की केवल एक सामाजिक संस्था नहीं, बल्कि उसकी संस्कृति, परंपरा और सामुदायिक जीवन की महत्वपूर्ण पाठशाला माना जाता है। यहां नई पीढ़ी अपने समाज की परंपराओं, लोकगीतों, नृत्य, अनुशासन और सामूहिक जीवन के तौर-तरीकों से परिचित होती है। चेलिक यानी युवक और मोटियारिन यानी युवतियां पारंपरिक गीतों और नृत्यों के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाते हैं। इसलिए घोटुल की रौनक लौटना महज मनोरंजन का लौटना नहीं, बल्कि सांस्कृतिक जीवन के फिर से सक्रिय होने का संकेत है।
अबूझमाड़ लंबे समय तक नक्सल हिंसा और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों के कारण सामान्य जनजीवन से दूर रहा। संघर्ष के माहौल का असर गांवों की सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों पर भी पड़ा। ग्रामीणों के अनुसार, भय और अनिश्चितता के वातावरण में शाम होते ही लोग अपने घरों में सिमट जाते थे। सार्वजनिक स्थानों पर जुटना, उत्सव मनाना और पारंपरिक आयोजनों में हिस्सा लेना आसान नहीं था। घोटुल जैसी सामुदायिक परंपराएं भी प्रभावित हुईं और कई स्थानों पर इनकी गतिविधियां थम गईं।
लेकिन अब परिस्थितियों में बदलाव महसूस किया जा रहा है। सुरक्षा अभियानों और नक्सल प्रभाव में कमी के बाद ग्रामीणों के बीच भरोसा बढ़ा है। गांवों में सामान्य गतिविधियां धीरे-धीरे गति पकड़ रही हैं। इसी बदलाव का सबसे सुंदर दृश्य घोटुलों में दिखाई दे रहा है, जहां शाम होते ही युवाओं की भीड़ जुटती है और पारंपरिक गीतों की आवाज दूर तक सुनाई देती है।
ग्रामीणों का कहना है कि हिंसा के दौर की शामें उन्हें आज भी याद हैं। पुलिस और नक्सलियों के बीच संघर्ष के कारण उन्हें हर समय अनहोनी की आशंका रहती थी। कभी रास्तों पर निकलने में डर लगता था तो कभी गांव में किसी अप्रिय घटना की चिंता बनी रहती थी। ऐसे माहौल में त्योहार, गीत-संगीत और सामुदायिक मिलन भी प्रभावित होते थे। कई ग्रामीण उस दौर को याद करते हुए कहते हैं कि उन्हें ऐसा लगता था जैसे उनका अपना गांव भी उनके लिए सुरक्षित नहीं रहा।
अब वही गांव अलग तस्वीर पेश कर रहे हैं। शाम ढलते ही युवा घोटुल की ओर पहुंचते हैं। मांदर की थाप शुरू होती है और उसके साथ पारंपरिक गीतों की स्वर लहरियां वातावरण में फैल जाती हैं। युवतियां और युवक पारंपरिक अंदाज में नृत्य करते हैं। बुजुर्ग भी इस बदलाव को उम्मीद की नजर से देखते हैं। उनके लिए यह दृश्य अपनी पुरानी सांस्कृतिक परंपराओं की वापसी जैसा है।
अबूझमाड़ की आदिवासी संस्कृति प्रकृति और सामुदायिक जीवन से गहराई से जुड़ी हुई है। यहां के लोकगीतों में जंगल, नदी, पहाड़, खेती, ऋतु, प्रेम, सामाजिक संबंध और जीवन के अनुभवों की झलक मिलती है। मांदर और दूसरे पारंपरिक वाद्य इन गीतों को जीवंत बनाते हैं। घोटुल में होने वाले सामूहिक कार्यक्रम नई पीढ़ी को इन परंपराओं से जोड़ने का काम करते हैं।
नक्सल प्रभाव के कम होने से केवल सुरक्षा का वातावरण नहीं बदल रहा, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए भी जगह बन रही है। ग्रामीणों के लिए सामान्य जीवन की वापसी का अर्थ है खेतों में निर्भय होकर जाना, बाजार और गांवों के बीच आवाजाही बढ़ना, त्योहारों में खुलकर शामिल होना और अपने पारंपरिक सामाजिक आयोजनों को फिर से जीवित करना।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में नक्सलवाद के खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों का उल्लेख करते हुए ग्रामीण क्षेत्र में आए बदलाव को सुरक्षा व्यवस्था से जोड़कर देखते हैं। हालांकि ग्रामीणों के लिए इस बदलाव का सबसे बड़ा अर्थ उनके रोजमर्रा के जीवन में दिखाई देने वाली शांति है। उनका कहना है कि जब गांव में भय कम होता है तो बच्चों की हंसी, युवाओं के गीत और बुजुर्गों की बातचीत भी सहज रूप से लौट आती है।
घोटुलों में बढ़ती चहल-पहल इसी भरोसे की तस्वीर है। यह वह स्थान है जहां युवा केवल नृत्य और गीत नहीं करते, बल्कि अपनी पहचान से जुड़ते हैं। लोक परंपराओं को सीखते हैं और उन्हें अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी निभाते हैं। इसलिए घोटुल की गतिविधियां बढ़ना अबूझमाड़ में सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत माना जा सकता है।
इस बदलाव में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि संस्कृति किसी बाहरी प्रयास से थोपी हुई चीज नहीं है। जब परिस्थितियां अनुकूल होती हैं तो वह स्वयं लोगों के जीवन में लौट आती है। अबूझमाड़ में भी यही देखने को मिल रहा है। जहां पहले शाम का मतलब सन्नाटा और आशंका हो सकता था, वहीं अब कई गांवों में शाम का मतलब घोटुल की ओर जाते कदम, मांदर की थाप और सामूहिक गीत बन रहा है।
हालांकि इस सांस्कृतिक पुनर्जीवन को स्थायी बनाने के लिए केवल सुरक्षा पर्याप्त नहीं होगी। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सड़क, संचार और स्थानीय युवाओं के लिए अवसरों का विस्तार भी जरूरी है। साथ ही आदिवासी समुदाय की परंपराओं और सांस्कृतिक संस्थाओं का सम्मान करते हुए उनके संरक्षण और संवर्धन पर ध्यान देना होगा। स्थानीय बुजुर्गों और युवाओं की भागीदारी इस प्रक्रिया को और मजबूत कर सकती है।
अबूझमाड़ की धरती पर घोटुल में गूंजती मांदर की थाप इसलिए खास है, क्योंकि यह सिर्फ एक वाद्य की आवाज नहीं है। इसमें सामान्य जीवन की वापसी की ध्वनि सुनाई देती है। इसमें उन गांवों की उम्मीद है, जिन्होंने लंबे समय तक हिंसा और भय का सामना किया। इसमें नई पीढ़ी का अपनी जड़ों से जुड़ने का उत्साह है और उन बुजुर्गों की खुशी भी, जो अपनी संस्कृति को फिर से जीवंत होते देख रहे हैं।
शाम का अंधेरा गहराता है, लेकिन घोटुलों में रौनक बढ़ती जाती है। गीतों के साथ कदम थिरकते हैं, मांदर की थाप तेज होती है और पूरा माहौल सामूहिक उल्लास से भर जाता है। अबूझमाड़ में यह बदलता दृश्य बताता है कि जब भय पीछे हटता है तो जीवन अपनी पुरानी लय फिर पकड़ लेता है। घोटुलों की लौटती रौनक उसी लय की सबसे जीवंत अभिव्यक्ति है—एक ऐसा संदेश कि अबूझमाड़ अपनी सांस्कृतिक पहचान के साथ फिर से मुस्कुराने लगा है।




